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    NEWSBUZZ INDIA

    नासा का मून मिशन अटका:रॉकेट के हीलियम फ्लो में दिक्कत आई; 50 साल बाद चांद की कक्षा में जाएंगे 4 इंसान

    6 months ago

    अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा का मून मिशन आर्टेमिस II टल सकता है। इस मिशन को 6 मार्च को लॉन्च किया जाना था। उससे पहले ही रॉकेट के हीलियम फ्लो में दिक्कत सामने आ गई। स्पेस एजेंसी ने बताया कि बीती रात रॉकेट के ऊपरी स्टेज में हीलियम का फ्लो रुक गया। लॉन्च के लिए सॉलिड हीलियम फ्लो की जरूरत होती है। NASA ने कहा कि वह सारे डेटा को रिव्यू कर रहा है और अगर जरूरी हुआ तो रॉकेट को फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर के लॉन्च पैड से हैंगर ले जाया जाएगा। हालांकि इंजीनियर लॉन्च पैड पर ही दिक्कत ठीक करने की कोशिश करेंगे। स्पेस एजेंसी ने कहा कि इंजीनियर दोनों ऑप्शन की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि इसका असर लॉन्चिंग पर जरूर पड़ेगा। आर्टेमिस II मून मिशन के दौरान एस्ट्रोनॉट्स चांद पर कदम नहीं रखेंगे। ये एक फ्लाईबाई मिशन है जिसके तहत एस्ट्रोनॉट्स सिर्फ चांद के चक्कर लगाकर वापस आ जाएंगे। पिछले 50 सालों में यह पहली बार होगा जब इंसान चांद की कक्षा में जाएगा। अगर ये मिशन सफल होता है 2028 में आर्टेमिस-3 मिशन भेजा जाएगा, जिसमें जाने वाले एस्ट्रोनॉट्स चांद पर पैर रखेंगे। नासा 50 साल बाद चांद पर एस्ट्रोनॉट्स भेजने वाला है आर्टेमिस-2 मिशन के तहत चार एस्ट्रोनॉट्स चांद के चारों तरफ चक्कर लगाकर वापस धरती पर आएंगे। इस क्रू में पहली बार एक महिला और एक अफ्रीकन-अमेरिकन (अश्वेत) एस्ट्रोनॉट भी शामिल होगा। 10 दिन के इस मून मिशन के लिए क्रिस्टीना हैमॉक कोच को विशेषज्ञ के तौर पर चुना गया है। इससे पहले क्रिस्टीना सबसे ज्यादा समय तक अंतरिक्ष में रहने का रिकॉर्ड बना चुकी हैं। उनके अलावा अमेरिकी नेवी के विक्टर ग्लोवर को भी बतौर पायलट चुना गया है। वो पहले ब्लैक एस्ट्रोनॉट होंगे जो मून मिशन पर स्पेस जाएंगे। 22 लाख किलोमीटर की यात्रा का टारगेट आर्टेमिस-2 मिशन के दौरान करीब 22 लाख किलोमीटर की यात्रा करेगा। इसका मकसद ये जांचना है कि ओरियन स्पेसशिप के सभी लाइफ-सपोर्ट सिस्टम ठीक से डिजाइन किए गए हैं। जिससे एस्ट्रोनॉट्स को डीप स्पेस में जाने और 2028 में मून लैंडिंग के दौरान परेशानी न हो। आर्टेमिस II वापस लौटने से पहले चंद्रमा के सुदूर भाग से कुछ 10,300 किलोमीटर दूर तक जाएगा। नासा ने 15 नवंबर, 2022 को तीसरी कोशिश में आर्टेमिस-1 मिशन लॉन्च किया था। ये 25 दिन बाद 14 लाख मील की यात्रा पूरी करके 10 दिसंबर को धरती पर लौट आया था। इससे पहले दिसंबर 1972 में अपोलो-17 मिशन ही चांद के इतने करीब पहुंचा था। 50 साल पुराने अपोलो मिशन से अलग है आर्टेमिस ​​​​​ अपोलो मिशन की आखिरी और 17वीं फ्लाइट ने 1972 में उड़ान भरी थी। इस मिशन की परिकल्पना अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जे एफ केनेडी ने सोवियत संघ को मात देने के लिए की थी। उनका लक्ष्य अमेरिका को साइंस एंड टेक्नोलॉजी की फील्ड में दुनिया में पहले स्थान पर स्थापित करना था। हालांकि करीब 50 साल बाद माहौल अलग है। अब अमेरिका आर्टेमिस मिशन के जरिए रूस या चीन को मात नहीं देना चाहता। नासा का मकसद पृथ्वी के बाहर स्थित चीजों को अच्छी तरह एक्सप्लोर करना है। चांद पर जाकर वैज्ञानिक वहां की बर्फ और मिट्टी से ईंधन, खाना और इमारतें बनाने की कोशिश करना चाहते हैं। -------------------- ये खबर भी पढ़ें… NASA ने माना- सुनीता का अंतरिक्ष में फंसना खतरनाक था: इसे कल्पना चावला के साथ हुए हादसे जैसा माना अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने माना कि सुनीता विलियम्स का अंतरिक्ष में फंसना खतरनाक था। नासा ने इस मिशन को दुर्घटना की टाइप ए कैटेगरी में रखा गया है। इसी कैटेगरी को दुर्घटना की सबसे गंभीर कैटेगरी माना जाता है। चैलेंजर और कोलंबिया शटल दुर्घटनाओं के लिए भी इसी कैटेगरी का इस्तेमाल किया गया था। पूरी खबर पढ़ें…
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