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    पूर्व विधायक कॉमरेड हेतराम बेनीवाल का निधन:94 साल की उम्र में ली अंतिम सांस, किसानों के लिए सरकारों को झुकाने वाली आवाज खामोश

    6 months ago

    राजस्थान की वामपंथी राजनीति और किसान-मजदूर आंदोलनों का बड़ा चेहरा रहे माकपा के कद्दावर नेता एवं पूर्व विधायक हेतराम बेनीवाल का 23 फरवरी की रात निधन हो गया। 94 वर्षीय बेनीवाल ने श्रीगंगानगर के टांटिया अस्पताल में रात 10:58 बजे अंतिम सांस ली। वे तीन दिन पहले हीमोग्लोबिन की कमी के कारण हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे। ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद उन्हें हैवी निमोनिया हो गया, जिससे उनकी हालत बिगड़ती चली गई। सोमवार रात 12:30 बजे उनका पार्थिव शरीर उनके निवास 8 एलएनपी ले जाया गया। अंतिम संस्कार मंगलवार शाम 4 बजे पैतृक गांव 8 एलएनपी में किया जाएगा। जनसंघर्षों से निकले इस जननेता का राजनीतिक सफर छह दशकों से अधिक समय तक सक्रिय रहा। किसानों-मजदूरों लिए आंदोलन कर दो बार सरकारों को निर्णय बदलकर झुकने पर मजबूर कर दिया था। उनकी पत्नी चंद्रावली देवी का पिछले वर्ष निधन हो चुका है। परिवार में दो बेटे और एक बेटी हैं। 1967 से 2004 तक सक्रिय राजनीति: संघर्ष ही पहचान 16 अक्टूबर 1932 को जन्मे हेतराम बेनीवाल ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत वामपंथी विचारधारा से की। उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के टिकट पर 1967 में संगरिया विधानसभा क्षेत्र से पहला चुनाव लड़ा। 1977 में टिकट नहीं मिलने के कारण वे चुनाव मैदान में नहीं उतरे, लेकिन जनसंघर्षों से दूरी नहीं बनाई। वर्ष 1990-91 में वे संगरिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। हालांकि विधानसभा भंग होने के कारण उनका कार्यकाल करीब ढाई वर्ष ही रहा। संगरिया क्षेत्र के पुनर्गठन के बाद जब सादुलशहर विधानसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया, तब उन्होंने 2004 में अंतिम बार चुनाव लड़ा और सक्रिय चुनावी राजनीति को विराम दिया। आंदोलनों के रणनीतिकार, सरकारों को झुकाने वाला नेतृत्व हेतराम बेनीवाल को किसान और मजदूर नेता के रूप में जननायक की पहचान मिली। उन्होंने राजस्थान कैनाल जमीन आवंटन आंदोलन, घड़साना किसान आंदोलन, जेसीटी मिल मजदूर आंदोलन तथा भाखड़ा और गंगनहर से जुड़े अनेक किसान आंदोलनों का सफल नेतृत्व किया। 1971-72 में आईजीएनपी (इंदिरा गांधी नहर परियोजना) के प्रथम चरण के जमीन आवंटन को लेकर चले आंदोलन में उनकी भूमिका अहम रही। उनके नेतृत्व में चले आंदोलनों के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया की सरकार को निर्णयों में बदलाव करना पड़ा था। 2003 में भी वसुंधरा सरकार के दौरान किसानों से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने आंदोलन खड़ा कर सरकार को झुकने पर मजबूर किया। कांग्रेस शासनकाल की इमरजेंसी के दौरान भी वे जेल गए और यातनाएं झेलीं, लेकिन अपने विचारों से पीछे नहीं हटे। बेबाक भाषण शैली: बिना माइक के भी हजारों को बांध लेते थे कामरेड बेनीवाल की सबसे बड़ी ताकत उनकी बुलंद और बेबाक आवाज थी। वे बिना माइक के भी हजारों की भीड़ को घंटों संबोधित कर लेते थे। उनके भाषणों में तीखा व्यंग्य, स्पष्टवादिता और जमीनी सच्चाई झलकती थी 2004 से शुरू हुए घड़साना-रावला किसान आंदोलन के दौरान जनता के बीच सिर्फ एक ही नाम गूंजता था -हेतराम बेनीवाल। लोग उनके एक इशारे पर आंदोलन के लिए तैयार हो जाते थे। वे किसानों को एकजुट रहने की शपथ दिलाते और अपने अनोखे अंदाज में नारे लगाकर आंदोलन को जनांदोलन में बदल देते थे। विधानसभा में भी उनका अंदाज अलग था। 1991-92 में सदन में शोरगुल के बीच उन्होंने तत्कालीन अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा से कहा- पहले इन्हें चुप कराइए, तब बोलूं। इस पर अध्यक्ष ने मुस्कराते हुए कहा- आप अपने स्वभाव से बोलिए, वे खुद चुप हो जाएंगे। राजनीति में जमीनी संघर्ष उनसे सीखा - पवन दुग्गल पूर्व विधायक पवन दुग्गल ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि हेतराम बेनीवाल सिर्फ राजनेता नहीं, बल्कि किसान और मजदूरों के मसीहा थे। अपनी ठोस और बेबाक बात रखने की शैली के कारण वे लोगों को बांधकर रखने की अद्भुत कला रखते थे। दुग्गल ने कहा कि भले ही आज वे अलग दल में हों, लेकिन राजनीति में जमीनी संघर्ष की सीख उन्होंने बेनीवाल से ही ली। घड़साना आंदोलन के दौर में जनता के तन-मन में सिर्फ एक ही नाम था- हेतराम बेनीवाल।
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